संकष्टी चतुर्थी भगवान श्री गणेश को समर्पित एक अत्यंत फलदायी व्रत है। यह व्रत हर माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से गणपति बप्पा की पूजा करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है

संकष्टी चतुर्थी का महत्व
हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा गया है। संकष्टी का अर्थ है — संकट से मुक्ति।
इस दिन व्रत रखने से:
- आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं
- विवाह, संतान और नौकरी से जुड़ी बाधाएं समाप्त होती हैं
- मानसिक तनाव और नकारात्मकता कम होती है
चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक अत्यंत धर्मपरायण ब्राह्मण परिवार रहता था। परिवार में सुख-समृद्धि की कोई कमी नहीं थी, लेकिन लंबे समय तक संतान न होने के कारण वे अत्यंत दुखी रहते थे।
एक दिन किसी विद्वान ऋषि ने उन्हें संकष्टी चतुर्थी व्रत रखने की सलाह दी। ब्राह्मण दंपति ने पूरे विधि-विधान से व्रत रखना प्रारंभ किया और हर महीने भगवान गणेश की पूजा तथा व्रत कथा का श्रवण करने लगे।
कुछ ही समय में भगवान गणेश की कृपा से उन्हें एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति हुई। लेकिन दुर्भाग्यवश एक दिन वह बालक अचानक बीमार पड़ गया और उसकी मृत्यु हो गई। माता-पिता अत्यंत शोक में डूब गए।
उसी रात भगवान गणेश ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा —
“तुमने संकष्टी चतुर्थी व्रत का फल पा लिया है, लेकिन अब इसे छोड़ दिया है। पुनः श्रद्धा और नियम से व्रत करो।”
ब्राह्मण दंपति ने फिर से संकष्टी चतुर्थी व्रत आरंभ किया। उनकी श्रद्धा देखकर भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उनके पुत्र को पुनः जीवनदान दिया।
तभी से यह मान्यता है कि संकष्टी चतुर्थी व्रत सच्चे मन से करने पर असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
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संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि (संक्षेप में)
- प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें
- भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें
- दूर्वा, मोदक, लाल फूल और चंदन अर्पित करें
- संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करें
- रात में चंद्रमा को अर्घ्य दें
- चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलें
संकष्टी चतुर्थी व्रत के लाभ
- जीवन के सभी संकटों से मुक्ति
- व्यापार और नौकरी में उन्नति
- विवाह में आ रही बाधाएं दूर
- संतान सुख की प्राप्ति
- मानसिक शांति और आत्मविश्वास में वृद्धि
निष्कर्ष
संकष्टी चतुर्थी व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था, संयम और विश्वास का प्रतीक है। जो भी भक्त श्रद्धा और नियम से इस व्रत को करता है, उस पर भगवान गणेश की विशेष कृपा बनी रहती है।
“जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा

